गधा और मूर्ति – moral story in Hindi

gadha aur murti ki panchtantra ki naitik kahani Hindi mein

एक बार की बात है, एक गाँव मे एक मूर्तिकार रहता था। वह देवी-देवताओं की बहुत सुन्दर-सुन्दर मूर्तिया बनाया करता था।

एक बार उसने किसी ग्राहक के लिए कृष्ण भगवान जी की एक बहुत सुंदर मूर्ति बनाई।

अब वह मूर्ति उसे ग्राहक के पास पहुचानी थी। लेकिन वह मूर्ति वजन में भारी थी इसलिए उसने एक कुम्हार से एक गधा किराए पर ले लिया।

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फिर उसने उस मूर्ति को गधे पर रखा और चल पड़ा। रास्ता थोड़ा बड़ा था।

रास्ते मे जो कोई भी उस मूर्ति को देखता था वह पल भर रूककर भगवान की मूर्ति की तारीफ जरूर करता था।

कुछ लोगों ने तो भगवान की मूर्ति को देखते ही झुककर प्रणाम भी किया। यह देख कर उस मूर्ख गधे ने सोचा कि लोग उस की प्रशंसा कर रहे हैं।

और उसी को झुककर प्रणाम कर रहे है वह अकड़कर सड़क के बीच में ही खड़ा हो गया। और जोर-जोर से आवाज़ निकालने लगा।

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मूतिकार ने गधे को पुचकार कर उसे चुप करने की बहुत कोशिश की। पर गधा ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ निकालता ही रहा। क्यूंकि वह अपने घमंड में बहुत ज्यादा था|

अंत मे उस मूर्तिकार ने डंडे से उसकी खूब पिटाई की। मार खाने के बाद गधे का सारा घंमड उतर गया। अब जाकर उसके होश ठिकाने आये और उसे समझ में आया की लोग उसे प्रणाम नहीं कर रहे थे।

फिर उसके बाद वह वहां से चुपचाप चलने लगा।

शिक्षा:

समझदार के लिए इशारा काफी होता है परन्तु मूर्खों के लिए डंडे की जरुरत होती ही है|

गधा और मूर्ति | Donkey and Statue panchtantra moral story in Hindi

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